You are currently viewing Class 10 History V.V.I Subjective Questions & Answer Chapter – 4 भारत में राष्ट्रवाद
Class 10 History V.V.I Subjective Questions & Answer Chapter - 4 भारत में राष्ट्रवाद

Class 10 History V.V.I Subjective Questions & Answer Chapter – 4 भारत में राष्ट्रवाद

                                            

                                          ( 2 – Marks Questions )

 

प्रश्न:1  साइमनकमीशन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें ।

उत्तर – भारत में संवैधानिक सुधार के मुद्दे पर विचार करने हेतु 1919 के भारत अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि 10 वर्ष के बाद आयोग नियुक्त किया जाएगा । यह आयोग अधिनियम में परिवर्तन पर विचार करेगा । सर जॉन साइमन के नेतृत्व में 1927 को साइमन कमीशन बना । जिस सात सदस्यीय आयोग का गठन किया गया उसमें एक भी भारतीय नहीं था । भारत के स्वशासन के संबंध में निर्णय विदेशियों द्वारा किया जाना था । फलतः 3 फरवरी , 1928 को बम्बई पहुँचने पर साइमन कमीशन का पूरे भारत में विरोध हुआ और जनता पुनः संघर्ष के लिए तैयार हो गई ।

प्रश्न:2  रॉलेटएक्ट से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर – रॉलेट एक्ट , न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा निर्मित क्रांतिकारी विरोधी एवं अराजकतापूर्ण अधिनियम था । समिति की अनुशंसा पर क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम को 21 मार्च , 1919 को केन्द्रीय विधान परिषद में पारित किया गया । इसके अंतर्गत एक विशेष न्यायालय के गठन का प्रावधान था । जिसके निर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती थी । किसी भी व्यक्ति को बिना साक्ष्य या वारंट के कहीं भी , किसी समय , गिरफ्तार किया जा सकता था । इस एक्ट के विरोध में गाँधी जी की अध्यक्षता में एक सत्याग्रह सभा आयोजित की गई और गिरफ्तारियाँ दी गई । 6 अप्रैल , 1919 को देशव्यापी हड़ताल आयोजित हुआ ।

प्रश्न:3 किसानआन्दोलन पर एक टिप्पणी लिखें ।

उत्तर – भारत एवं बिहार के किसान आन्दोलनों में 1917 ई . के चंपारण आन्दोलन का प्रमुख स्थान है । यह आन्दोलन उस व्यवस्था के खिलाफ था जिसमें प्रत्येक किसान को अपनी भूमि के 3/20 हिस्से पर नील की खेती करनी होती थी । इस उपज को अत्यन्त कम कीमत पर उनसे ले लिया जाता था । व्यापार के घाटे को किसानों से वसूल किया जाता रहा । लगान भी बढ़ा दी गई । चम्पारण के राजकुमार शुक्ल ने 1916 ई . के लखनऊ अधिवेशन में किसानों की परेशानियों से अवगत कराते हुए महात्मा गाँधी को चम्पारण आने को कहा । गाँधीजी ने चम्पारण में सत्याग्रह चलाकर किसानों को राहत पहुँचाई । इसके अतिरिक्त 1922-23 ई ० में मुंगेर में शाह मुहम्मद जुबैर की अध्यक्षता में किसान सभा स्थापित हुई । 4 मार्च , 1928 ई ० को बिहटा , ( पटना जिला ) में स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने किसान सभा की स्थापना की । नवम्बर , 1929 ई ० में सोनपुर मेला में ही स्वामी सहजानन्द की अध्यक्षता में प्रांतीय किसान सभा की स्थापना की गई । श्रीकृष्ण सिंह इसके सचिव बने । इस प्रकार , बिहार में भी किसानों के संगठन के कई प्रयास हुए ।

                                        ( 5 – Marks Questions )

 

प्रश्न:1 भारतमें राष्ट्रवाद के उदय के सामाजिक कारणों पर प्रकाश डालें ।

उत्तर – राष्ट्रवाद के उदय में ब्रिटिश सरकार की प्रजाति भेद की नीति भी महत्वपूर्ण कारक थी । अंग्रेज अपने को श्रेष्ठ समझते थे । भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे । भारतीयों को अंग्रेजों के साथ रेलयात्रा करने की मनाही थी । क्लबों एवं , सड़कों पर होटलों में अंग्रेज भारतीयों से दुर्व्यवहार करते थे । इससे भारतीय जनता अंग्रेजों के प्रति घृणा भाव में भरती गई । सरकारी सेवाओं में भी भारतीयों को पक्षपात का शिकार होना पड़ा । भारत का शासन भार इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारियों के हाथ था । इस परीक्षा में भारतीयों को सम्मिलित होना कठिन था । यदि कोई सफल हो गया तो उसकी नियुक्ति में बाधा उत्पन्न करके उसे पदच्युत करने की सरकारी मंशा रहती थी । सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ भी ऐसा ही किया गया । अतः भारतीय शिक्षित वर्ग एवं मध्यम वर्ग ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद किया ।

 

प्रश्न:2 भारतमें मजदूर आन्दोलन के विकास का वर्णन करें ।

उत्तर – भारत में मजदूर वर्ग में भूमिहीन किसान तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप नष्ट हुए कुटीर उद्योगों के कारीगर थे । न्यूनतम वेतन , कार्य घण्टों का आधिक्य , गंदे तथा असुरक्षित वातावरण में कार्य करना , मजदूर , स्त्रियों तथा बच्चों का शोषण आदि समस्याएँ भारतीय मजदूरों को लम्बे समय तक झेलनी पड़ी । मजदूर वर्ग के विकास के साथ ही पूँजीपतियों से उनके हितों के रक्षार्थ कानून बनाने की बात शुरू हुई । 1903 ई ० में सुब्रह्मण्यम आन्दोलन का प्रभाव भी मजदूर आन्दोलन पर पड़ा । मजदूरों का प्रथम – प्रमुख आन्दोलन 1917 ई . में अहमदाबाद के मजदूरों द्वारा प्लेग बोनस के प्रश्न पर था । प्लेग समाप्त होने पर मिल मालिक इसे बंद करना चाहते थे जबकि मजदूर इसे प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बढ़ी महँगाई की भरपाई हेतु पूर्ववत ( वेतन का 50 % ) चाहते थे । मिल मालिकों द्वारा केवल  20 % देने पर मजदूर हड़ताल पर चले गये । गाँधीजी ने पूरी स्थिति का अध्ययन कर मजदूरों को 35 % वृद्धि की सलाह दी । उन्होंने मजदूरों के साथ सत्याग्रह किया और अंतत : उन्हें 35 % की वृद्धि दिलाकर आन्दोलन को सफल बनाया । फलस्वरूप 31 अक्टूबर , 1920 ई . को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस ( एटक ) की स्थापना हुईं । काँग्रेस द्वारा श्रमिकों तथा किसानों को राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रक्रिया में भागीदार बनाने तथा माँगों को समर्थन देने की बात हुई । ‘ एटक ‘ पर अहिंसा तथा वर्ग सहयोग जैसे गाँधीवादी दर्शन का भी प्रभाव था । साम्यवादी आन्दोलन के उत्कर्ष के फलस्वरूप मजदूर संघ आन्दोलनों में कुछ क्रांतिकारी और सैनिक भावना आ गई । उग्रवादी प्रभावों के परिप्रेक्ष्य में मजदूर संघ आन्दोलनों की बढ़ती क्रियाशीलता से सरकार चिंतित हो गई । इन आन्दोलनों पर रोक लगाने के उद्देश्य से श्रमिक विवाद अधिनियम 1929 ई ० तथा नागरिक सुरक्षा अध्यादेश , 1929 ई ० बनाए गए । इसी समय कुछ साम्यवादी नेताओं पर राजद्रोह का मुकदमा मेरठ में चलाया गया । इससे श्रमिक आन्दोलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा । 1931 ई . में एटक का विभाजन हो गया । एटक से अलग होकर भारतीय ट्रेड यूनियन संघ नामक एक नया संगठन बना । इसके बाद मजदूर आन्दोलन में वामपंथी राष्ट्रवादियों जैसे नेहरू एवं सुभाषचन्द्र बोस जैसे नेताओं का प्रभाव रहा ।

प्रश्न:3 भारतीयराष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना किन परिस्थितियों में हुई ? अथवा , अखिल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना कैसे हुई ? इसके प्रारंभिक उद्देश्य क्या थे ?

उत्तर –19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आधुनिक शिक्षा पद्धति के प्रसार , समाचार पत्रों के विकास एवं यूरोपीय आन्दोलन से भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का दिन – प्रतिदिन विकास हो रहा था । इसी परिप्रेक्ष्य में कई संगठन भी स्थापित हो रहे थे । ऐसा ही एक संगठन ” इण्डियन एसोसिएशन ‘ राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहा था । इसके चलते रेंट बिल , लिटन प्रेस एक्ट तथा शस्त्र अधिनियम वापस ले लिया गया । भारतीय राष्ट्रवादियों ने इन सभी का प्रभावी विरोध किया । भारी विरोध के कारण प्रेस अधिनियम वापस ले लिया गया । भारतीय राष्ट्रवादियों ने यह समझ लिया कि प्रभावी विरोध करने के लिए संगठित होना आवश्यक है । लॉर्ड रिपन के काल में इल्बर्ट बिल का यूरोपियनों द्वारा संगठित होकर विरोध करने से भारतीयों में राष्ट्रवाद , संगठित होने की समझ तथा अंग्रेजों के प्रति क्षोभ की भावना उत्पन्न हुई । इन्हीं परिस्थितियों में 1883 ई ० में इण्डियन एसोसिएशन ने बिखरे राष्ट्रवादियों को एकजुट करने हेतु नेशनल कॉन्फ्रेंस बुलाया । दूसरी ओर एक रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारी ए ० ओ ० ह्यूम ने भी इसी उद्देश्य से 1884 ई . भारतीय राष्ट्रीय संघ की स्थापना की । ह्यूम भारतीय नेताओं तथा वायसराय से लगातार विचार – विमर्श करते रहे । इन्हें ब्रिटिश पार्लियामेंट्री कमिटी का समर्थन भी प्राप्त था । उनके प्रयासों से 25-28 दिसम्बर पूना में प्लेग फैलने के कारण यह बैठक गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज बम्बई में हुई और यहीं से संगठन का नाम बदल कर अखिल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस कर दिया गया । इस तरह भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना हुई ।

प्रारम्भिक उद्देश्य –

( i ) राष्ट्रीय हित से जुड़े संगठनों के मध्य एकता स्थापित करना ।

( ii ) देशवासियों के मध्य मित्रता एवं सद्भावना स्थापित करना ।

( iii ) राष्ट्रीय एकता का सुदृढीकरण ।

( iv ) प्रार्थना पत्रों एवं स्मार पत्रों द्वारा वायसराय एवं काउंसिल में सुधारों हेतु प्रयास करना ।

 

प्रश्न:4  भारतीयराष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गाँधी क्यों लोकप्रिय हुए ? उनके योगदानों एवं राजनीतिक कार्यक्रमों पर संक्षिप्त चर्चा करें ।

उत्तर – महात्मा गाँधी अपने सत्य , अहिंसा एवं सत्याग्रह के शस्त्रास्त्र से लैस हो भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में 1919 ई . से 1947 ई . तक छाए  रहे । भारतीय इतिहास में इस अवधि को गाँधी युग के नाम से जाना जाता है । इससे पूर्व गाँधीजी ने चम्पारण तथा खेड़ा में कृषक आन्दोलन तथा अहमदाबाद में मजदूर आन्दोलन का नेतृत्व किया और उसमें सफलता प्राप्त कर राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली नेता की पहचान बनाई । महात्मा गाँधी पहले ब्रिटिश सरकार के सहयोगी थे और प्रथम विश्वयुद्ध में उनके सहयोग के कारण सरकार ने उनहें ‘ कैसर – ए – हिन्द ‘ की उपाधि दी थी किन्तु शीघ्र ही सरकार के कुछ नीतियों ने उन्हें असहयोग आन्दोलन करने पर विवश कर दिया । ये नीतियाँ थीं रॉलेट एक्ट , जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड , खिलाफत समस्या आदि । जालियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने कैसर – ए – हिन्द ‘ की उपाधि लौटा दी । 1919 ई ० में महात्मा गाँधी अखिल भारतीय खिलाफत आन्दोलन के अध्यक्ष बने । गाँधीजी के नेतृत्व में 1930 ई ० में ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ दूसरा जन – आन्दोलन सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया गया । गाँधीजी 250 किमी ० की पदयात्रा कर दांडी पहुँचे और वहाँ नमक कानून तोड़ कर इस आन्दोलन की शुरुआत की । यह जन- -आन्दोलन तो था ही इसमें महिलाओं एवं बच्चों ने भी बढ़ – चढ़ कर भाग लिया । 8 अगस्त , 1942 ई . को गाँधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरुआत की । इसमें उन्होंने ” करो या मरो ‘ का नारा दिया था । इस आन्दोलन में विशाल जन – समूह स्वतः स्फूर्त रहा । आन्दोलन ने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति लगभग तय कर दी । गाँधीजी के सतत् प्रयत्नों के परिणामस्वरूप अंततः 15 अगस्त , 1947 ई ० को भारत की आजादी प्राप्त हो गई । इस प्रकार गाँधीजी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन – जन तक पहुँचा कर इसे जन – आन्दोलन बना दिया जिसमें समाज के सभी वर्गों की भागीदारी थी । इस जन – आन्दोलन में गाँधीजी ने जनता को सत्य , अहिंसा और सत्याग्रह रूपी तीन हथियार प्रदान किया । इसी के बल पर उन्होंने भारत को आजाद कराया एवं राष्ट्रपिता कहलाने का सम्मान प्राप्त किया ।

प्रश्न:5 प्रथम विश्वयुद्ध का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ अंतसंबंधों की विवेचना करें ।

उत्तर – प्रथम विश्वयुद्ध विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी । इस युद्ध ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया । इसी क्रम में इसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को भी प्रभावित किया । प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने पर जब भारतीय आजादी की उम्मीद कर रहे थे , उन पर और कठोर नियंत्रण स्थापित करने वाला रॉलेट एक्ट 1919 ई ० में पारित किया गया । रॉलेट एक्ट के विरोध के क्रम में 13 अप्रैल , 1919 ई ० का प्रसिद्ध जालियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ । प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व दिए गए आश्वासन के बिल्कुल उल्टा अंग्रेजों के आचरण ने भारतीयों को राष्ट्रीय आन्दोलन करने के लिए बाध्य किया । प्रथम विश्वयुद्ध का प्रत्यक्ष प्रभाव खिलाफत आन्दोलन के रूप में सामने आया । इस युद्ध में इस्लामिक दुनिया के राजनैतिक तथा आध्यात्मिक नेता ( खलीफा ) आन्दोलन तुर्की ब्रिटेन से हार गया था । उस पर सख्त संधि थोपे जाने की खबर से भारतीय मुसलमानों में नाराजगी बढ़ी । उधर लखनऊ समझौता ने मुसलमानों और हिन्दुओं को एकता प्रदान की इस स्थिति में गाँधीजी ने खिलाफ के मुद्दे पर असहयोग आन्दोलन की तैयारी की । प्रथम विश्वयुद्ध के बाद से भारत में महँगाई और बेरोजगारी दोनों ही बढ़ गई । युद्ध के दौरान इंग्लैंड में आर्थिक संकट के कारण भारत में उनका आयात रुक गया । इसका लाभ भारतीय उद्योगपतियों को हुआ । युद्ध समाप्त होने पर पुनः स्थितियाँ बदल गईं । भारतीय उद्योगपति चाहते थे कि विदेशी वस्तुओं के आयात पर सरकार भारी शुल्क लगाए । सरकार के ऐसा नहीं करने पर भारतीय उद्योगपतियों ने महसूस किया कि मजबूत राष्ट्रीय आन्दोलन द्वारा दबाव बनाकर इसे प्राप्त किया जा सकता है । प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीयों के मन में गोरों की श्रेष्ठता का भय दूर कर दिया । युद्ध के दौरान यूरोपीय शक्तियों द्वारा परस्पर खिलाफ प्रचार तथा उपनिवेशों में उनके बर्बर और असभ्य व्यवहार का पर्दाफाश किया गया । प्रथम विश्वयुद्ध से जुड़ी उपरोक्त घटनाएँ तथा परिस्थितियों ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को बढ़ावा दिया ।

प्रश्न:6 सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारणों की विवेचना करें । अथवा , सविनय अवज्ञा आन्दोलन के किन्हीं पाँच कारणों की व्याख्या करें ।

उत्तर – गाँधीजी के नेतृत्व में ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ 1930 ई ० में चलाया गया सविनय अवज्ञा आन्दोलन दूसरा जन आन्दोलन था । असहयोग आन्दोलन के बाद भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में शून्यता आ गई थी । परन्तु पुनः कुछ कारणों के चलते सविनय अवज्ञा आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई । ये कारण निम्नलिखित थे

( i ) साइमन कमीशन-  भारत में संवैधानिक सुधार के मुद्दे पर विचार करने हेतु 1919 के भारत अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि 10 वर्ष के बाद आयोग नियुक्त किया जाएगा । यह आयोग अधिनियम में परिवर्तन पर विचार करेगा । सर जॉन साइमन के नेतृत्व में 1927 को साइमन कमीशन बना । जिस सात सदस्यीय आयोग का गठन किया गया उसमें एक भी भारतीय नहीं था । भारत के स्वशासन के संबंध में निर्णय विदेशियों द्वारा किया जाना था । फलत : 3 फरवरी , 1928 को बम्बई पहुँचने पर साइमन कमीशन का पूरे भारत में विरोध हुआ और जनता पुनः संघर्ष के लिए तैयार हो गई ।

( ii ) नेहरू रिपोर्ट- साइमन कमीशन के विरोध के समय तत्कालीन भारत सचिव लार्ड बिस्कनहैड ने भारतीयों को एक सर्वमान्य संविधान निर्माण की चुनौती दी । अत : 1928 ई . में काँग्रेस ने दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया । इसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे । इसमें नेहरू रिपोर्ट द्वारा ” डोमिनियन स्टेट ” का दर्जा माँगा गया जिससे काँग्रेस का ही एक वर्ग असहमत था । इसी समय मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा दोनों ही साम्प्रदायिकता की भावना को फैला रहे थे । अत : गाँधीजी ने इससे निपटने के लिए सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम रखा ।

( iii ) विश्वव्यापी आर्थिक मंदी – 1929-30 ई . के आर्थिक मंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था भी त्रस्त थी । इस स्थिति में भी अंग्रेजों ने भारत से धन का निष्कासन चालू रखा । जनता त्रस्त होकर सरकार के खिलाफ हो गयी । अतः आन्दोलन के लिए यह उपर्युक्त अवसर था ।

( iv ) क्रांतिकारी आन्दोलन- मेरठ षड्यंत्र , लाहौर षड्यंत्र , चटगाँव लूट जैसे क्रांतिकारी आन्दोलन जनता का ध्यान खींच रहे थे । ऐसे में काँग्रेस शांत नहीं बैठ सकती थी ।

( v ) समाजवाद का बढ़ता प्रभाव –समाजवादी विचारधारा का प्रभाव काँग्रेस में महसूस किया जा रहा था । इस प्रभाव को संतुलित करने हेतु एक आन्दोलन की आवश्यकता थी ।

( vi ) पूर्ण स्वराज्य की माँग- काँग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर 31 दिसम्बर , 1929 ई ० को मध्य रात्रि में रावी तट पर नेहरू ने काँग्रेसी झंडा फहराया तथा 26 जनवरी , 1930 ई . को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस मनाया जाना तय किया गया । इससे जनता उत्साहित हो आन्दोलन के लिए तैयार बैठी थी । इस प्रकार , उपरोक्त कारणों से स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन का वातावरण बन चुका था । आन्दोलन करने से पूर्व गाँधीजी ने वायसराय इरविन के समक्ष  – सूत्री मांगों को रखा और पूरा किये जाने की स्थिति में प्रस्तावित आन्दोलन स्थगित करने की बात की । इरविन ने गाँधीजी के माँगों पर कोई विचार नहीं किया । अत : बाध्य होकर गाँधीजी ने दांडी मार्च कर सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत कर दी । उन्होंने नमक कानून तोड़ा एवं संपूर्ण भारतवासियों को अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन के लिए तैयार करने का मंत्र प्रदान किया ।

Leave a Reply