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Class 10 Science Chapter - 9 आनुवंशिकता एवं जैव विकास Subjective Question In Hindi

Class 10 Science Chapter – 9 आनुवंशिकता एवं जैव विकास Subjective Question In Hindi

प्रश्न:1  जैव विकास किसे कहते हैं?

उत्तर:-  जीवविज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवों की उत्पत्ति तथा उसके पूर्वजों का इतिहास तथा समय-समय पर उनमें हुए क्रमिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता हैं, जैव विकास कहलाता है।

 

प्रश्न:2 जैव विकास तथा वर्गीकरण का अध्ययन क्षेत्र किस प्रकार परस्पर संबंधित है?

उत्तर:- जीवों में वर्गीकरण का अध्ययन उनमें विद्यमान समानताओं और भेदों के आधार पर किया जाता है। उनमें समानता इसलिए प्रकट होती है कि वे किसी समान पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं और उनमें भिन्नता विभिन्न प्रकार के पर्यावरणों में की जानेवाली अनुकूलता के कारण से है। उनमें बढ़ती जटिलता को जैव विकास के उत्तरोत्तर क्रमिक आधार पर स्थापित कर अंतर्संबंधों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

 

प्रश्न:3  जीवों में उत्परिवर्तन का मुख्य कारण क्या है?

उत्तर:- जीवों में उत्परिवर्तन का मुख्य कारण अनुवांशिक विभिन्नता है। यह अर्द्धसूत्री विभाजन के समय होता है, जो नई जाति के विकास में अहम भूमिका निभाता है।

 

प्रश्न:4  गुणसूत्र का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।

उत्तर:- एक गुणसूत्र में एक या दो क्रोमेटिड होते हैं, जो सेन्ट्रोमियर से जुड़े होते हैं। गुणसूत्र DNA से बना होता है।

 

प्रश्न:5 जीन कोश क्या है?

उत्तर:- किसी भी प्रजाति विशेष के एक समष्टि या आबादी में स्थित समस्त जीन उस आबादी का जीन कोश (gene pool) कहलाता है। जीन कोश के कुछ जीन में वातावरणीय कारणों से कुछ बदलाव आ सकता है। जीन में होनेवाले ऐसे चयनित बदलाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होते रहते हैं।

 

प्रश्न:6 कायिक विभिन्नता से क्या समझते हैं?

उत्तर:-  वैसी विभिन्नताएँ जो गुणसूत्र या जीन के गुणों में विभिन्नता के कारण उत्पन्न नहीं होती है, वरन अन्य कारण जैसे जलवायु एवं वातावरण से उत्पन्न होती है कायिक विभिन्नता कहलाता है।

 

प्रश्न:7 जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए ही लाभदायक है, परंतु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है, क्यों?

उत्तर:- जीवों में पायी जानेवाली विभिन्नता, नई जाति के प्रादुर्भाव में मदद करता है। नये वातावरण एवं प्रतिकूल परिस्थिति में स्थायित्व कायम रखता है। यह विभिन्नता व्यष्टि के लिए लाभदायक नहीं होती है। क्योंकि किसी निश्चित स्थान पर प्राकृतिक आपदाएँ इसे नष्ट कर देती हैं।

 

प्रश्न:8  आनुवंशिकी से क्या समझते हैं?

उत्तर:- जीवविज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत संतति में जाने वाले लक्षण का अध्ययन करते हैं, आनुवंशिकी कहलाता है।

 

प्रश्न:9  आनुवंशिक गुण से क्या समझते हैं?

उत्तर:- प्रकृति में कोई भी दो जीव बिलकुल एक समान नहीं होते हैं। इनमें कुछ-न-कुछ असमानताएँ अवश्य होती हैं। जीवों में विभिन्नताओं की अधिकता के फलस्वरूप जीवन के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। जीवन के लिए संघर्ष में वही जीव योग्यतम होते हैं जो सबसे अधिक योग्य गुणों वाले होते हैं, अर्थात् शक्तिशाली होते हैं। अयोग्य गुणों वाले जीव नष्ट हो जाते हैं। प्राकृतिक चुनाव द्वारा प्राप्त जीवों की उपयोगी भिन्नताएँ फिर दूसरी पीढ़ी में, उनके संतानों में वंशागत होती है। इस तरह ये भिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होती हैं। यही आनुवंशिक गुण हैं।

 

प्रश्न:10 जेनेटिक्स (genetics) या आनुवंशिकी किसे कहते हैं?

उत्तर:- जेनेटिक्स (genetics) या आनुवंशिकी, आनुवंशिकी एवं विभिन्नता का अध्ययन है जो कि जीवविज्ञान की एक विशेष शाखा के अंतर्गत होता है।

 

प्रश्न:11 मेंडल के मटर के पौधों पर प्रयोग से क्या परिणाम निकला?

उत्तर:- मेंडल के मटर के पौधों पर किए प्रयोग से निम्नलिखित परिणाम निकलें

(i) पौधों में लक्षण कुछ इकाइयों द्वारा नियंत्रित होते हैं। उन्हें कारक कहा जाता है। प्रत्येक लक्षण के लिए युग्मक में एक कारक होता है, जैसे लंबाई, फूल का रंग।

(ii) एक लक्षण को दो कारकों द्वारा ही व्यक्त किया जाता है, जैसे TT या tt l

 

प्रश्न:12  मेंडल ने किन सात लक्षणों पर अपना प्रयोग किया था ?

उत्तर:-  मेंडल ने मटर के पौधे पर अपना प्रयोग किया था, जिनमें निम्न लक्षण को चुना गया था-

(i) पौधे की लंबाई,

(ii) पुष्प का रंग,

(iii) बीज का आकार,

(iv) बीज का रंग,

(v) फल का आकार,

(vi) फल का रंग,

(vii) फल की आकृति।

 

प्रश्न:13 मेंडल का स्वतंत्र विन्यास का नियम (Mendels’s law of independent assortment) क्या है ?

उत्तर:- मेंडल का स्वतंत्र विन्यास का नियम (Mendels law of independent assortment) के अंतर्गत एक आनुवंशिक लक्षण का प्रभावी गुण दूसरे के प्रभावी गुण से ही नहीं, बल्कि अप्रभावी गुण से भी मिल सकता है। इसी प्रकार, एक का अप्रभावी गुण दूसरे के अप्रभावी गुण से ही नहीं, बल्कि प्रभावी गुण से भी मिल सकता है।

 

प्रश्न:14 मेंडल की सफलता का मुख्य कारण क्या है?

उत्तर:- मेंडल की सफलता का मुख्य कारण है कि उन्होंने मटर के पौधे पर प्रयोग किया था, जिसमें विभिन्न रंग एवं प्रकार के पुष्प होते हैं। इसके सारे क्रोमोसोम एक दूसरे से दूर स्थित थे, जिसके कारण मिश्रित नहीं हो पाते थे।

 

प्रश्न:15 लिंग-क्रोमोसोम किसे कहते हैं?

उत्तर:- मनुष्य में 23 जोड़े क्रोमोसोम होते हैं। इनमें 22 जोड़े क्रोमोसोम एक ही प्रकार के होते हैं, जिसे ऑटोसोम (autosomes) कहते हैं। तेईसवाँ जोड़ा भिन्न आकार का होता है, जिसे लिंग क्रोमोसोम (sex chromosomes) कहते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं—X और Y, X क्रोमोसोम लंबा और छड़ के आकार का (rod- shaped) होता है, Y क्रोमोसोम अपेक्षाकृत बहुत छोटे आकार का होता है। नर में X और Y दोनों लिंग-क्रोमोसोम मौजूद होते हैं, पर मादा में Y क्रोमोसोम अनुपस्थित होता है। उसके स्थान पर एक और X क्रोमोसोम होता है अर्थात् मादा में दोनों x क्रोमोसोम होते हैं। ये X और Y क्रोमोसोम ही मनुष्य में लिंग-निर्धारण (sex determination) के लिए उत्तरदायी (responsible) होते हैं।

 

प्रश्न:16  हम अपने माता-पिता के समान क्यों होते हैं?

उत्तर:- प्रत्येक जीव में बहुत से ऐसे गुण होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी माता-पिता अर्थात् जनकों से उनके संतानों में संचरित होते रहते हैं। ऐसे गुणों को आनुवंशिक गुण या पैतृक गुण कहते हैं। इन्हीं गुणों के कारण हम अपने माता-पिता के समान होते हैं।

 

प्रश्न:17 क्रोमोसोम से क्या समझते हैं?

उत्तर:- नाभिक के अंदर क्रोमेटिन के धागे पाए जाते हैं, जो कोशिका विभाजन के समय संघनित होकर क्रोमोसोम का निर्माण करते हैं।

 

प्रश्न:18 जीन क्या है ? कोशिका में इसका उपस्थिति स्थल कहाँ है?

उत्तर:-  सभी गुणों का जनकों से अपनी संतति में संचरण का माध्यम जीन है। कोशिका में यह गुणसूत्र पर केंद्रक के अंदर पाया जाता है।

 

प्रश्न:19  प्रभावी व अप्रभावी लक्षण किसे कहते हैं?

उत्तर:- लैंगिक जनन वाले जीवों में एक अभिलक्षण (Trait) के जीन के दो प्रतिरूप (copies) होते हैं । इन प्रतिरूपों के एकसमान न होने की स्थिति में जो अभिलक्षण व्यक्त होता है उसे प्रभावी लक्षण तथा अन्य को अप्रभावी लक्षण कहते हैं।

 

प्रश्न:20 जीनप्ररूप या जीनोटाइप किसे कहते हैं?

उत्तर:-  किसी जीव की जीनी संरचना (genetic constitution) उस जीव का जीन प्ररूप या जीनोटाइप (genotype) कहलाता है। जीवों के गुणों

जैसे— शारीरिक गठन, लंबाई, त्वचा एवं बालों का रंग इत्यादि) का निर्धारण उनके जीन प्ररूपों के कारण ही होता है। जीन प्ररूप के कारण प्रकट होनेवाले गुणों की नींव का निर्धारण जनकों (माता-पिता) के यग्मकों के संयोजन के समय ही हो जाता है।

 

प्रश्न:21 यदि एक लक्षण (trait) A अलैंगिक प्रजनन वाली समष्टि के 10% सदस्यों में पाया जाता है तथा B उसी समष्टि में 90% जीवों में पाया जाता है, तो कौन-सा लक्षण पहले उत्पन्न होगा, और क्यों?

उत्तर:- अलैंगिक जनन के अन्तर्गत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आपस में बहुत अधिक समानताएँ होती हैं। उनमें आपस में बहुत कम अन्तर होता है। इसी आधार पर जो लक्षण अधिक प्रतिशत मात्रा में समष्टि के सदस्यों में उपस्थित है वह लक्षण पहले भी उत्तेजित रहा होगा । अतः लक्षण B जो समष्टि 90% जीवों में है पहले उत्पन्न हुआ होगा।

 

प्रश्न:22 संतति में नर तथा मादा जनकों द्वारा आनुवंशिक योगदान में बराबर की भागीदारी किस प्रकार सुनिश्चित की जाती है?

उत्तर:- एक स्पीशीज के प्रत्येक सदस्य की कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या समान होती है। लैंगिक प्रजनन में प्रत्येक गुणसूत्र दो समान लंबाई वाले भागों में बँट जाता है। प्रत्येक क्रोमेटिड कहलाता है। हर क्रोमेटिड लैंगिक प्रजनन में सक्रिय भाग लेता है जिन्हें नर तथा मादा युग्मक कहते हैं। केवल एक युग्मक ही लैंगिक जनन में भाग नहीं ले सकता। अतः नर तथा मादा पिताओं के युग्मक लैंगिक जनन में सक्रिय भाग लेते हैं तथा आनुवंशिकता सुनिश्चित होती है।

 

प्रश्न:23 डार्विनवाद के बारे में बताएँ।

उत्तर:- चार्ल्स डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीव में प्रजनन की असीम क्षमता होती है, पर पृथ्वी पर भोजन एवं आवास नियत है। अतः जीवों में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आपस में संघर्ष होता है।

 

प्रश्न:24  जंतु वर्गीकरण के विभिन्न स्तरों का नाम लिखें।

उत्तर:- जंतु वर्गीकरण के विभिन्न स्तरों के नाम निम्नलिखित हैं- जगत (kingdom), उपजगत (subkingdom), फाइलम (phylum) या डिवीजन (division), वर्ग (class), गण (order), कुल (family), वंश (genus) तथा जाति (species)| इस पदानुक्रम में जीवों के वर्गीकरण का आधार उनके गुणों में समानता तथा असमानता है।

 

प्रश्न:25  उपार्जित लक्षण क्या है?

उत्तर:- परिवर्तित वातावरण के कारण जीवों के अंगों का उपयोग ज्यादा या कम होता है। जिन अंगों का उपयोग अधिक होता है वे अधिक विकसित हो जाते हैं तथा जिनका उपयोग नहीं होता है उनका धीरे-धीरे ह्रास हो जाता है। वातावरण के सीधे प्रभाव से या अंगों के कम या अधिक उपयोग के कारण जंतु के शरीर में जो परिवर्तन होते हैं, उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired character) कहते हैं।

 

प्रश्न:26 वे कौन से कारक हैं जो नयी स्पीशीज के उद्भव में सहायक हैं?

उत्तर:-  नई स्पीशीज के उद्भव में वर्तमान स्पीशीज के सदस्यों का परिवर्तनशील पर्यावरण में जीवित बने रहना है। इन सदस्यों को नये पर्यावरण में जीवित रहने के लिए कुछ बाह्य लक्षणों में परिवर्तन करना पड़ता है। अतः भावी पीढ़ी के सदस्यों में शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं जो संभोग क्रिया के द्वारा अगली पीढ़ी में हस्तांतरित हो जाते हैं परंतु यदि दूसरी कॉलोनी के नर एवं मादा जीव वर्तमान पर्यावरण में संभोग करेंगे तब उत्पन्न होने वाली पीढ़ी के सदस्य जीवित नहीं रह सकेंगे।

 

प्रश्न:27 वे कौन-से विभिन्न तरीके हैं जिनके द्वारा एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है।

उत्तर:- वे विभिन्न तरीके जिनके द्वारा एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है, निम्नलिखित हैं-

(i) जीन कोश के कुछ जीन में वातावरणीय कारणों से कुछ बदलाव आ सकता है।

(ii) दूसरी स्थिति में आनुवंशिक विभिन्नता हो सकती है।

(iii) तीसरी स्थिति में आनुवंशिक विचलन (genetic drift -जीन की बारंबारता में निरुद्देश्य होनेवाला परिवर्तन)।

 

प्रश्न:28 आण्विक जातिवृत्त क्या है?

उत्तर:- मानव सहित विभिन्न जीवों के पूर्वजों की खोज उनके DNA में हुए परिवर्तन का अध्ययन कर किया जा सकता है। DNA में परिवर्तन का अर्थ उसके प्रोटीन अनुक्रम (protein sequence) में परिवर्तन से है। DNA अनुक्रम (DNA sequence) के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा किसी जीव के पूर्वजों की खोज आण्विक जातिवृत्त (molecular phylogeny) कहलाता है।

 

प्रश्न:29 बाघों की संख्या में कमी आनुवंशिकता के दृष्टिकोण से चिंता का विषय क्यों है?

उत्तर:-  पर्यावरण परिवर्तन में प्रतिकूलता ही बाघों की संख्या में कमी का मुख्य कारण है । जनन के कारण लक्षण प्रतिकूल वातावरण में भी यथावत् रहते हैं। परंतु अगर पर्यावरण व वातावरण बाघों के लिए अनुकूल न रहा हो और इस पर ध्यान न दिया गया तो इन्हें समाप्त होने या नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता।

 

प्रश्न:30 जाति उद्भवन से क्या समझते हैं? इसका क्या कारण है?

उत्तर:- नई प्रजातियों का निर्माण जाति उद्भवन कहलाता है। लैंगिक जनन करने वाले जीवों में अंतः प्रजनन, आनुवंशिक विचलन तथा प्राकृतिक चुनाव के द्वारा जाति उद्भवन होता है।

 

प्रश्न:31 क्या भौतिक पृथक्करण अलैंगिक जनन वाले जीवों के जाति-उद्भव का प्रमुख कारक हो सकता है? क्यों या क्यों नहीं?

उत्तर:- भौतिक पृथक्करण अलैंगिक जनन वाले जीवों के जाति- -उद्भव का प्रमुख कारक है, विशेषकर अलैंगिक जनन कर रहे पादपों में। एक जीवधारी भौतिक परिस्थितियों में जीवित रहता है परंतु कुछ जीवधारी यदि निकटवर्ती भौगोलिक पर्यावरण में विस्थापित हो जाते हैं जिनमें विभिन्न भौतिक परिवर्तनीय लक्षण हों तो वे जीवित नहीं रहेंगे। यदि जीवित रह रहे जीवधारियों में अलैंगिक जनन होता है और फिर वे अन्य पर्यावरण में विस्थापित होते हैं तो वे भी भिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित नहीं रह पायेंगे।

 

प्रश्न:32 पक्षियों का विकास डायनोसौर से क्यों माना जाता है?

उत्तर:- डायनोसौर सरीसृप थे। उनके विभिन्न जीवाश्मों में अस्थियों के साथ पंखों की छाप भी स्पष्ट रूप से मिलती है। तब शायद वे सब इन पंखों की सहायता से नहीं पाते होंगे पर बाद में पक्षियों ने पंखों से उड़ना सीख लिया होगा। इसलिए पक्षियों की डायनोसौर से संबंधित मान लिया जाता है।

 

प्रश्न:33 क्या एक तितली और चमगादड़ के पंखों को समजात अंग कहा जा सकता है ? क्यों अथवा क्यों नहीं?

उत्तर:- एक तितली और चमगादड़ के पंखों को समजात अंग नहीं कहा जा सकता। हालांकि तितली तथा पक्षी (चमगादड़) के पंख (wings) उड़ने का कार्य करते हैं, परंतु इनकी मूल संरचना और उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार की होती है। चमगादड़ के पंख में अस्थियाँ, त्वचा तथा पर (feathers) होते हैं, जबकि तितली या अन्य कीटों के पंख क्यूटिकल के परत से ढंके होते हैं तथा इनमें कुछ तंत्रिकीय पेशियाँ होती हैं।

 

प्रश्न:34 आनुवंशिक विभिन्नता के स्रोतों का वर्णन करें।

उत्तर:- जीवों में आनुवंशिक विभिन्नता उत्परिवर्तन के कारण होता है तथा नई जाति (species) के विकास में इसका योगदान हो सकता है। क्रोमोसोम पर स्थित जीन की संरचना तथा स्थिति में परिवर्तन ही उत्परिवर्तन के कारण है। आनुवंशिक विभिन्नता का दूसरा कारण है आनुवंशिक पुनर्योग (genetic recombination) भी है। आनुवंशिक पुनर्योग के कारण संतानों के क्रोमोसोम में जीन के गुण (संरचना तथा क्रोमोसोम पर उनकी स्थिति) अपने जनकों के जीन से भिन्न हो सकते हैं। अत: उत्परिवर्तन तथा आनुवंशिक पुनर्योग जीव में नए गुणों की उत्पत्ति के कारण हो सकते हैं। ऐसे नए गुण जीवों को अपने वातावरण के अनुसार अनुकूलन में सहायक हो सकते हैं। कभी-कभी ऐसे नए गुण जीवों को वातावरण में अनुकूलित होने में सहायक नहीं भी होते हैं । ऐसी स्थिति में आपसी स्पर्धा, रोग इत्यादि कारणों से वैसे जीव विकास की दौड़ में विलुप्त हो जाते हैं। बचे हुए जीव ऐसे लाभदायक गुणों को अपने संतानों में संचरित करते हैं। इस तरह प्रकृति नए गुणों वाले जीवों का चयन कर लेती है तथा कुछ को निष्कासित कर देती है। प्राकृतिक चयन (natural selection) द्वारा नए गुणों वाले जीवों का विकास इसी प्रकार होता है।

 

प्रश्न:35  विभिन्नता को परिभाषित करें। जननिक विभिन्नता एवं कायिक विभिन्नता में विभेद करें। जीवों में आनुवंशिक विभिन्नताओं का संचयन कैसे होता है?

उत्तर:- जीवों के ऐसे गुण जो उन्हें अपने जनकों अथवा अपनी ही जाति के अन्य सदस्यों के उसी गुण के मूल स्वरूप से भिन्नता दर्शाते हैं, विभिन्नता कहलाते हैं। जननिक विभिन्नता एवं कायिक विभिन्नता में निम्न अंतर हैं- जनन कोशिकाओं में होनेवाले परिवर्तन के कारण होनेवाली विभिन्नता, जननिक विभिन्नता या आनुवंशिक विभिन्नता कहलाती है। ऐसी विभिन्नताएँ एक पीढ़ी से था दूसरी पीढ़ी में वंशागत होती है। वैसी विभिन्नताएँ जो गुणसूत्र सर जीन के गुणों में विभिन्नता के कारण उत्पन्न नहीं होती है वरन अन्य कई कारणों जैसे जलवायु है। एवं वातावरण का प्रभाव, उपलब्ध भोजन के प्रकार, अन्य उपस्थित जीवों के साथ परस्पर व्यवहार आदि के कारण उत्पन्न हो, कायिक विभिन्नताएँ कहलाती है। जीवों में आनुवंशिक विभिन्नताओं का संचयन जीन की प्रतिलिपि से बनती है।

 

प्रश्न:36 अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न विभिन्नताएँ अधिक स्थायी होती हैं, व्याख्या कीजिये। यह लैंगिक प्रजनन करने वाले जीवों के विकास को किस प्रकार प्रभावित करता है?

उत्तर:- अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न विभिन्नताएँ अधिक स्थायी होती हैं। अलैंगिक जनन एक ही जीव से होने के कारण केवल उसी के गुण उसकी संतान में जाते हैं और वे बिना परिवर्तन हुए पीढ़ी दर पीढ़ी समान ही रहते हैं। लैंगिक जनन नर और मादा के युग्मकों के संयोग से होता है जिसमें भिन्न-भिन्न जीन होने के कारण संकरण के समय विभिन्नता वाली संतान उत्पन्न होती है। जैसे सभी मानव युगों पहले अफ्रीका में उत्पन्न हुए थे पर जब उनमें से अनेक ने अफ्रीका थे छोड़ दिया और धीरे-धीरे सारे संसार में फैल गए। इस कारणवश लैंगिक जनन से उत्पन्न विभिन्नताओं के कारण उनकी त्वचा का रंग, कद, आकार आदि में परिवर्तन आ गया।

 

प्रश्न:37 आनुवंशिकी की परिभाषा दीजिए। जीव विज्ञान की इस शाखा को मेण्डल का क्या योगदान है?

उत्तर:- आनुवंशिकी जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत आनुवंशिकता और विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। मेण्डल को आनुवंशिकी का जनक माना जाता है। उन्होंने मटर के पौधों पर संकरण सम्बन्धी तरह-तरह के प्रयोग किए थे और तीन नियमों को प्रतिपादित किया।

(i) प्रभाविता का नियम (Law of dominance) – संकरण में भाग लेने वाले पौधों का प्रभावी गुण प्रकट होता है और अप्रभावी गुण छिप जाता है।

(ii) पृथक्करण का नियम (Law of segregation) –युग्मकों की रचना के समय कारकों (Genes) के जोड़े अलग-अलग हो जाते हैं। इन दोनों में से केवल एक ही युग्मक के पास पहुँचता है। दोनों कारक कभी भी एक साथ युग्मक में नहीं जाते।

(iii) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of independent assortment) – कारक एक-दूसरे को प्रभावित किये बिना उन्मुक्त रूप से युग्मकों में जाते हैं और प्रकट होते हैं। उदाहरण के लिए द्विसंकर क्रॉस की दूसरी पीढ़ी की संतानों में सभी कारकों के गुण अलग-अलग दिखाई देते हैं पर पहली पीढ़ी में प्रभावी गुण ही प्रकट होता है।

 

प्रश्न:38  मेंडल का प्रथम नियम या पृथक्करण का नियम क्या है?

उत्तर:- मेंडल ने एकसंकर संकरण (monohybrid cross) में केवल एक जोड़े विपरीत गुणों की वंशागति का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि अप्रभावी गुण (बौनापन-recessive trait) में न तो कोई बदलाव आता है और न ही ऐसा गुण लुप्त होता है। संकर नस्ल की पीढ़ी में दोनों विपरीत गुण (opposite traits) साथ-साथ होते हैं। परंतु अगली पीढ़ियों में पृथक, अर्थात् अलग-अलग हो जाते हैं। यह निष्कर्ष मेंडल का प्रथम नियम या पृथक्करण का नियम (Mendel’s first law of segregation) कहलाता है। दो पीढ़ियों तक एक जोड़े विपरीत गुणों की वंशागति

 

प्रश्न:39 मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं?

उत्तर:- मेंडल ने मटर के पौधे के अनेक विकल्पी लक्षणों का अध्ययन किया जो स्थूल दिखते हैं। उदाहरणतः गोल/झुरींदार बीज, लंबे/बौने पौधे, सफेद/बैंगनी फूल इत्यादि। उसने विभिन्न लक्षणों वाले मटर के पौधों को लिया जैसे कि लंबे पौधे तथा बौने पौधे। इससे प्राप्त संतति पीढी में लंबे एवं बौने पौधों के प्रतिशत की गणना की। मेंडल के अपने प्रयोगों में दोनों प्रकार के पैतृक पौधों एवं F¹ पीढ़ी के लंबे पौधों की दूसरी पीढ़ी; अर्थात् F, पीढ़ी के सभी पौधे लंबे नहीं थे वरन् उनमें से एक चौथाई संतति बौने पौधे थे। यह इंगित करता है कि F पौधों द्वारा लंबाई एवं बौनेपन दोनों विशेषकों (लक्षणों) की वंशानुगति हुई। परंतु केवल लंबाई वाला लक्षण ही व्यक्त हो पाया। अतः लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न होनेवाले जीवों में किसी भी लक्षण की दो प्रतिकृतियों की वंशानुगति होती है। ये दोनों एक समान हो सकते हैं अथवा भिन्न हो सकते हैं जो उनके जनक पर निर्भर करता है।

 

प्रश्न:40 मानव में लिंग निर्धारण आनुवंशिक आधार पर होता है, चित्र द्वारा समझाएँ। अथवा, मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है?

उत्तर:- मानव के सभी गुणसूत्र पूर्णरूपेण युग्म नहीं होते। मानव में अधिकतर गुणसूत्र माता और पिता के गुणसूत्रों के प्रतिरूप होते हैं। इनकी संख्या 22 जोड़े हैं। परन्तु एक युग्म जिसे लिंग सूत्र कहते हैं वह पूर्ण जोड़े में नहीं होते। स्त्री में गुणसूत्र का पूर्ण युग्म होता है तथा दोनों ‘X’ कहलाते हैं। लेकिन पुरुष (नर) में यह जोड़ा परिपूर्ण जोड़ा नहीं होता, जिसमें एक गुणसूत्र सामान्य आकार का ‘X’ होता है तथा दूसरा गुणसूत्र छोटा होता है जिसे Y गुणसूत्र कहते हैं। अत: स्त्रियों में ‘XX’ तथा पुरुष में ‘XY गुणसूत्र होते हैं। इसमें सामान्यतः आधे बच्चे लड़के एवं आधे लड़की हो सकते हैं। सभी बच्चे चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, अपनी माता से ‘X’ गुणसूत्र प्राप्त करते हैं। अतः बच्चों का लिंग निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें अपने पिता से किस प्रकार गुणसूत्र प्राप्त हुआ है। जिसे अपने पिता से ‘X’ गुणसूत्र वंशानुगत हुआ लड़की एवं जिसे पिता से ‘Y’ गुणूसत्र वंशानुगत होता है वह लड़का होता है।

 

प्रश्न:41 एक ‘A’ रुधिर वर्ग वाला पुरुष एक स्त्री जिसका रुधिर वर्ग ‘O’ है से विवाह करता है। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग-0′ है । क्या यह सूचना पर्याप्त है यदि आपसे कहा जाये कि कौन-सा विकल्प लक्षण रुधिर वर्ग-‘A’ अथवा ‘O’ प्रभावी लक्षण हैं? अपने उत्तर का स्पष्टीकरण दीजिये।

उत्तर:- एक ‘A’ रुधिर वर्ग वाला पुरुष एक स्त्री जिसका रुधिर वर्ग ‘O’ है से विवाह करता है। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग ‘O’ है। यह सूचना पर्याप्त है यदि हमसे कहा जाये कि विकल्प लक्षण-रुधिर वर्ग-‘A’ अथवा ‘O’ प्रभावी लक्षण है। क्योंकि लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न होने वाले जीवों में किसी भी लक्षण की दो प्रतिकृतियों की (स्वरूप) वंशानुगति होती हैं। ये दोनों एक समान हो सकते हैं अथवा भिन्न हो सकते हैं जो उनके जनक पर निर्भर करता है।

 

प्रश्न:42 एकसंकर संकरण को F-पीढ़ी तक चित्र के द्वारा दर्शाएँ।

उत्तर:- एक लंबा पौधा को बौना पौधा से संकरण को निम्न तरीके से दिखाया जा सकता है-

 

प्रश्न:43 जैव विकास क्या है? लामार्कवाद का वर्णन करें।

उत्तर:- पृथ्वी पर वर्तमान जटिल प्राणियों का विकास प्रारंभ में पाये जाने वाले सरल प्राणियों से परिस्थिति और वातावरण के अनुसार होने वाले परिवर्तनों के कारण हुआ। सजीव जगत में होनेवाले इस परिवर्तन को जैव विकास (organic evolution) कहते हैं। फ्रांसीसी प्रकृति वैज्ञानिक लामार्क (Jean Baptiste Lamarck, 1744-1829) ने सबसे पहले 1809 में जैव विकास के अपने विचारों को अपनी पुस्तक फिलॉसफिक जूलौजिक (Philosophic Zoologique) में प्रकाशित किया। यही लामार्कवाद या उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिद्धांत (theory of inheritance of acquired characters) है। लामार्क के अनुसार जीवों की संरचना, कायिकी, उनके व्यवहार पर वातावरण के परिवर्तन का सीधा असर पड़ता है। इसके कारण जीवों के अंगों का उपयोग ज्यादा या कम होता है। जिन अंगों का उपयोग अधिक होता है वे अधिक या विकसित हो जाते हैं तथा जिनका उपयोग नहीं होता है, धीरे-धीरे उनका ह्रास हो जाता है। वातावरण के सीधे प्रभाव से या अंगों में कम या अधिक उपयोग के कारण ने जंतु के शरीर में जो परिवर्तन आते हैं उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired character) कहते हैं। यह लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रजनन द्वारा चले जाते हैं । ऐसा लगातार होने से कुछ पीढ़ियों के बाद उनकी शारीरिक रचना बदल जाती है तथा नदि एक नई प्रजाति का विकास हो जाता है।

 

प्रश्न:44  समजात अंग व असमजात अंग से क्या समझते हैं?

उत्तर:- समजात अंग (homologous)  –  भिन्न-भिन्न वातावरण में रहनेवाले जंतुओं के कुछ ऐसे अंग होते हैं जो संरचना एवं उत्पत्ति के दृष्टिकोण से तो एक समान होते हैं, परंतु अपने वातावरण वे भिन्न कार्यों का संपादन करते हैं। ऐसे अंग समजात अंग (homologous) कहलाते हैं। जैसे-मेढक, पक्षी, बिल्ली तथा मनुष्य के अग्रपादों (forelimbs) में पाये जाने वाले अस्थियों के अवयव प्रायः समान होते हैं, परंतु इन कशेरुक प्राणियों के अग्रपाद विभिन्न प्रकार के कार्यों का संपादन कर सकते हैं।

असमजात अंग (analogous organs) – समजात अंगों के विपरीत जंतुओं के कुछ अंग ऐसे होते हैं, जो रचना और उत्पत्ति या उद्भव के दृष्टिकोण से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, परंतु वह एक ही प्रकार का कार्य करते हैं। ऐसे अंग असमजात अंग (analogous organs) कहलाते हैं। जैसे—तितली तथा पक्षी के पंख (wings) उड़ने का कार्य करते हैं परंतु इनकी मूल संरचना और उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार की होती है।

 

प्रश्न:45 डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत की व्याख्या करें।

उत्तर:- डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीव में प्रजनन की असीम क्षमता होती है तथा प्रत्येक जीव ज्यामितीय अनुक्रम द्वारा अपनी जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। प्रत्येक जीव में अत्यधिक प्रजनन दर की तुलना में पृथ्वी पर भोजन तथा आवास नियत है। अतः जीवों में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आपस में संघर्ष होता रहता है। ये संघर्ष मुख्यत: तीन प्रकार के होते हैं।

(क) अपनी एक ही समष्टि के व्यष्टियों के बीच का संघर्ष

(ख) एक ही जाति के विभिन्न समष्टियों के बीच का संघर्ष तथा

(ग) जीवों का प्रतिकूल वातावरणीय परिस्थितियों में संघर्ष।

प्राकृतिक वरण द्वारा चयनित विभिन्नताएँ दूसरी पीढ़ी में उनके संतानों में वंशागत होती है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनके प्राकृतिक वरण से ही नये प्रजाति का निर्माण होता है।

 

प्रश्न:46 एक एकल जीव द्वारा उपार्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते। क्यों?

उत्तर:- वैसे जीव जिनमें लैंगिक जनन होता है, जनन कोशिकाओं (germ cells) का निर्माण उनके जनद या जनन ग्रंथि या गोनैड (genad) में होता है। शरीर की अन्य कोशिकाएँ कायिक या सोमैटिक सैल्स (Somatic cells) कहलाती है। वातावरण के प्रभाव के कारण कायिक कोशिकाओं में परिवर्तन, लोहार के हाथों की पेशियो का हथौड़ा चलाने के कारण मजबूत होता, चूहे की पूँछ काटने पर, इत्यादि गुण वंशागत नहीं होते अपितु इनकी अगली पीढ़ी सामान्य लक्षणों के साथ ही पैदा हुई जैसे लोहार की संतानों में मजबूत पेशियों का गुण वंशागत नहीं होता, कटे पूँछ्वाल चूहे की संतान पूँछ के साथ पैदा होती है, इत्यादि। यही कारण है कि एक एकर हैं । जीव द्वारा उपार्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होसे क्योंकि इससे जनन कोशिकाओं के जीन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

 

प्रश्न:47  जाति उदभवन कया है?

उत्तर:- जब दो उप-आवादियों के बीच जीन प्रवाह (gene flow), अर्थात आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान की संभावना कम होगी, तब वे अपनी ही उप-आबादी के सदस्यों के साथ लैंगिक प्रजनन कर यायेंग। ऐसी स्थिति में एक उप आबादी के दोनों जनकों के अप्रभावी उत्परिवर्तित जीनी (recessive mutant genes) के संयोजन की संभावना अधिक होगी। ऐसे जीन इस स्थिति में अब प्रभावी उत्परिवर्तित जीन (dominant mutant genes) की तरह व्यवहार करेंगे। इससे उत्पन्न गुण (traits) अब संतानों में परिलक्षित होंगे। इस तरह के गुण लाभदायक होने पर प्रकृति द्वारा उनका चुनाव होता है तथा एक नई उपप्रजाति का उद्भव होता है। यदि मूल प्रजाति से इनका लैंगिक प्रजनन संभव हो भी गया तो उत्पन्न संतानों में जनन क्षमता नहीं होगी। इससे एक या एक से अधिक उपप्रजातियाँ बन जाएँगी। यही जाति-उद्भवन (speciation) कहलाता है।

 

प्रश्न:48  क्या कारण है कि आकृति, आकार, रंग-रूप में उसने भिम दिखाई पड़ने वाले मानव एक ही स्पीशीज के सदस्य है?

उत्तर:- सभी दिशाओं में मानव का प्रव्रजन हुआ। आकृति, आकार, रंग-रूप में इतने भिन्न दिखाई पड़नेवाले मानव एक ही स्पीशीज के सदस्य है, मानव के DNA अनुक्रम तथा Y क्रोमोसोम तथा उनमें हुए उत्परिवर्तनों के अध्ययन से ही संभव हुआ है। आज रक्त के एक नमूने के विश्लेषण से किसी व्यक्ति के पूर्वजों की खोज की जा सकती है। इस विश्लेषण से यह भी जाना जा सकता है कि किसी ही व्यक्ति विशेष के पूर्वज संसार के किस भाग के मूल निवासी थे। ऐसा माइटोकॉण्डिया के DNA तथा क्रोमोसोम के अध्ययन से ही संभव हो पाया है। वर्तमान समय के तु सभी मानवों के जीन कोश (gene pool) एक समान होने के कारण सभी मानव एक ही प्रजाति (Homo sapiens) कहलाते हैं। हालाँकि विभिन्न क्षेत्रों के मानवों के गुणों की तुलना करने पर उनमें कई प्रकार की व्यक्तिगत विभिन्नताएँ पायी जाती हैं, जैसे- त्वचा तथा बालों के रंग, शरीर की लंबाई एवं गठन इत्यादि।

 

प्रश्न:49 क्या भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित स्पीशीज के पौधों के जाति-उद्भव का प्रमुख कारण हो सकता है। क्यों या क्यों नहीं।

उत्तर:-  भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित स्पीशीज के पौधों के जाति-उद्भव का प्रमुख कारण हो सकता है। जननीय लक्षण तथा भौतिक लक्षणं पौधों में दो प्रकार के पाये जाते हैं। जननीय लक्षण गुणसूत्रों पर उपस्थित डी० एन० ए० के द्वारा हस्तान्तरित होते हैं। भौतिक लक्षण भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं परन्तु है। गुणसूत्रों की संख्या एवं आकृति ज्यों की त्यों बनी रहती है। जननीय लक्षण अनुकूल परिस्थितियों में क्रियान्वित रहते हैं। अतः भौतिक लक्षणों में भिन्नता ही स्व-परागित पौधों में विभेदन का प्रमुख कारण होती है।

 

प्रश्न:50  किन प्रमाणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थो से हुई है?

उत्तर:- ज० बी० एस० हाल्डेन नामक एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम सुझाव दिया कि जीवों की उत्पत्ति उन अजैविक पदार्थों से हुई होगी जो पृथ्वी की उत्पत्ति के समय बने थे। सन् 1953 ई० में स्टेनल, एल० मिलर और हेसल्ड सी० डरे से ऐसे कृत्रिम वातावरण का निर्माण किया था जो प्राचीन वातावरण के समान था। इस वातावरण में ऑक्सीजन अनुपस्थित था। अमोनिया, मिथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड इसमें थे। एक पात्र में जल भी था जिसका तापमान 100°C से कम रखा गया था। जब गैसों के मिश्रण से चिंगारियाँ उत्पन्न गई जो आकाशीय बिजली के समान थीं, मिथेन से 15% कार्बन सरल कार्बनिक यौगिकों में बदल गए। इनमें अमीनो अम्ल भी संश्लेषित हुए जो प्रोटीन के अणुओं का निर्माण करते हैं। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थों से हुई है।

 

प्रश्न:51 उन अभिलक्षणों का एक उदाहरणा दीजिये जिनका उपयोग हम स्पीशीज के विकासीय संबंध निर्धारण के लिए करते हैं।

उत्तर:- बहुत अधिक भिन्न दिखने वाली संरचनाएँ एकसमान परिकल्प से विकसित हैं। जंगली गोभी इसका अच्छा उदाहरण है। दो हजार वर्ष पूर्व मनुष्य गोभी को एक खाद्य पौधे के रूप में उगाता था, तथा उसने चयन द्वारा इससे विभिन्न सब्जियाँ विकसित की।कुछ किसान इसको पतियों के बीच की दूरी कम करना चाहते थे जिससे पत्तागोभी का विकास हुआ। बंध्य पुष्यों से फूलनेही विकसित हुई।

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